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श्री गणेशाय नमः


Wednesday, October 22, 2008

कविता : तपिश ( Poem by Ravi Prakash Keshri)

आज सूरज अपने
रुबाब पर था
आसमान को
आग सा दहका रहा था !

दिहारी के लिए तैयार
हो रही बजंता
ने एक और फेंट
अपने सिर पर बांधी
ताकि सिर को
और सिर पर पड़े
बोझ को अच्छी तरह
से निभा सके !

सामने पड़े दुधमुहे
बच्चे की आवाज को
दरकिनार कर
निकल पड़ी मजदूरी पर
बिना तपिश की परवाह किए
क्योंकि पेट की तपिश
सूरज की तपिश से ज्यादा
होती है !
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

2 comments:

Manoj Kesarwani said...

Dear Ravi Prakash Ji,

Very true, nicely described...

Keep it up...we would like to see many more such compositions from you.

Also, thanks to Kesarwani eMagazine for providing a plateform to share all these.

With Best Regards,

Manoj Kesarwani
mkk123@gmail.com
Admin: Kesarwani.net / Kesarwani eGroup

Anonymous said...

I have started reading poems now after a long time.

Thanks to Mr Ravi.

Sanjeev Kesari JGM TCIL New Delhi