बाल दिवस पर विशेष - कब तक शोषित रहेंगे बच्चे
एक दिन मैं नगर के सुप्रसिद्ध होटल में चाय पीने पहुंचा। वहां दो बच्चे अपने धुन में मस्त होकर काम कर रहे थे। इनमें से एक टेबिल से गिलास प्लेट वगैरह उठा रहा था और दूसरा , टेबिल साफ कर चाय पानी सप्लाई कर रहा था। इसी समय उसके हाथ से कांच का गिलास छूटकर नीचे गिर गया और टूट गया। कांच उठाते समय कांच का टुकड़ा हाथ में चुभ गया और खून बहने गला। लड़के को काटो तो खून नहीं। एक ओर मालिक द्वारा डांट खाने और नौकरी से निकाल दिये जाने का भय , तो दूसरी ओर हाथ की मरहम पट्टी की चिंता। मैं उस बच्चे के मनोभावों को पढ़ने का प्रयास कर ही रहा था , तभी मालिक का गुस्से भरा स्वर सुनाई दिया '' वहां क्या मुंह ताक रहा है.......गिलास उठाना और साफ करने की तमीज नहीं और चले आते हैं मुफ्त की रोटी तोड़ने। अरे! ओ रामू के बच्चे , साले ने कितने गिलास तोड़ा है , जरा गिनकर बताना तो..... ? होटल मालिक का क्रोध भरा स्वर सुनकर वह बालक थर-थर कांपने लगा। तभी मालिक का एक तमाचा उसके गाल पर पड़ा फिर तो शुरू हो गयी पिटाई , कभी बाल खिंचकर , तो कभी लात से। मुझसे यह दृश्य देखा न गया और मैं उठकर चला आया। दिन भर वह घटना प...