लघु कथा : जमीर का लेंस: रुद्रपुर की आखिरी बावरी
सूरज अभी पहाड़ियों के पीछे ही था, लेकिन रुद्रपुर की हवाओं में एक अजीब सी घुटन पहले ही घुल चुकी थी। देवदार के पेड़ों की वह सोंधी खुशबू, जो कभी इस छोटे से पहाड़ी कस्बे की पहचान हुआ करती थी, अब सीमेंट और कंक्रीट की उड़ती धूल में कहीं दम तोड़ चुकी थी। चौदह साल का कबीर अपनी पुरानी, सेकंड-हैंड डीएसएलआर (DSLR) कैमरे की लेंस को साफ करते हुए एक गहरी सांस लेता है। उसे तस्वीरें खींचने का शौक था, लेकिन आजकल उसके कैमरे में पहाड़ों की खूबसूरती से ज्यादा, उनके उजड़ने की तस्वीरें कैद हो रही थीं। कबीर एक साधारण, मध्यवर्गीय परिवार से था। उसके पिता, दिनेश बाबू, कभी कस्बे के इकलौते सरकारी स्कूल में एक आदर्शवादी शिक्षक हुआ करते थे। लेकिन कुछ साल पहले, स्कूल के फंड में हो रहे घोटाले के खिलाफ आवाज उठाने पर उनका तबादला एक बहुत ही दूर-दराज के इलाके में कर दिया गया। उस घटना ने दिनेश बाबू को तोड़ दिया था। अब वे बस किसी तरह अपनी नौकरी बचाकर शांति से जीवन काटना चाहते थे। कबीर ने अपने पिता की उस हार को बहुत करीब से देखा था। इसलिए, उसके अंदर एक गहरा डर बैठ गया था—कि जो सच बोलता है, दुनिया उसे कुचल देती है। कबीर का एक ही सपन...