कविता: आतंक के ज़ख्म

आतंक के जख्म अब तक हरे है
हम अभी तक गुस्से से भरे है
ताज का हमला सीधे
दिल पर हुआ है
आतंक कब किसी मजहब से जुडा है

सीने को चीरती गोली
अब तक नसों में फंसी है
देख हमारी बुजदिली
दुनिया हम पर हँसी है
आतंक के जख्म अब तक हरे है
हम अब भी गुस्से से भरे है

कब तक हम अच्छाई
की माला जपेंगे
यह सच से डरे लोग
हमें यूं ही बर्बाद करेंगे
आतंक के जख्म अब तक हरे है
हम अभी तक गुस्से से भरे है

अगर अब भी हम
नींद से नही उठेंगे
तो ये यकीनन हमें
हाशिये पर कर देंगे
आतंक के जख्म अब तक हरे है
हम अभी तक गुस्से से भरे है

आओ हम भारत के
जख्म को मरहम लगायें
चाँद आंसू शहीदों और
नफरत नेता वास्ते जगाये
क्यों की
आतंक के जख्म अब तक हरे है
हम अभी तक गुस्से से भरे है


लेखक- रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

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