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प्रकृति की सुन्दरता देखो बिखरी चारों ओर है कहीं पर पीपल कहीं अशोक कहीं पर बरगद घोर है लाल गुलाब से सुर्ख है देखो धरती के दोनों गाल लिली मोगरा और चमेली मचा रहे है धमाल देखो हिम से भरा हिमालय नंदा की ऊँची पर्वत चोटी कल कल करती बहती देखो गंगा यमुना की निर्मल सोती प्रकृति ने हम सबको दिया जीवन का अनुपम संदेश आओ मिटाए मन की दूरी दूर हटाये कष्ट कलेश ! रवि प्रकाश केशरी वाराणसी
एक समय की बात है, एक घने जंगल के पास एक विशाल, बर्फ से ढका हुआ पहाड़ था। उस पहाड़ की ऊँचाई इतनी थी कि आसमान छूता प्रतीत होता था। उस पहाड़ की वजह से, जंगल के निचले हिस्से में रहने वाले जीव-जंतुओं के लिए जीवन जीना मुश्किल था, क्योंकि सर्दियों में, पहाड़ से बर्फ पिघलकर नदियों का रूप ले लेता था, जिससे पानी का बहाव बहुत तेज़ हो जाता था। इस पहाड़ पर एक नन्ही सी चींटी रहती थी, जिसका नाम था 'चुलबुली'। चुलबुली अन्य चींटियों की तरह मेहनत करती थी, लेकिन वह हमेशा पहाड़ के बारे में सोचती थी। वह देखती थी कि कैसे पहाड़ की विशालता और उसकी ठंडक से छोटे जीव-जंतु डरते हैं। एक दिन, चुलबुली ने फैसला किया कि वह इस पहाड़ की समस्या का समाधान करेगी। वह अपने साथियों को इकट्ठा किया और उन्हें पहाड़ की तलहटी में एक रास्ता खोजने के लिए प्रेरित किया। बाकी चींटियाँ हँसती थीं, "चुलबुली! पहाड़ से कैसे बात करेगी? हम तो यहाँ खाना ढूंढते हैं।" लेकिन चुलबुली ने उन्हें समझाया, "हम सीधे पहाड़ को हरा नहीं सकतीं। हमें पहाड़ की दरारों और उसके नीचे की मिट्टी का अध्ययन करना होगा। शायद हमें कुछ ऐसा खोजना होग...
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