कविता: अब क्या लिखू

अब क्या लिखू
दरकती दीवारों से
झांकती बचपन की यादें
सूखे नीम के पेड़ पर
लटका झूला
जिस पर शायद ही
कोई झूले और
आसमान को छूले
नुक्कड़ पर खड़े पोस्ट
बाक्स पर लटका ताला
शायद उमीदों पर भी
अब ऐसे ही तालों में बंद है
चूल्हे से निकलता धुंआ
अब इशारा करता है
की पेट की आग पर
पानी पड़ चुका है
सपने में सूख चुका है
उमीदों का समुन्दर
खुशियाँ गली में फिरती
और गम दिलों के अन्दर
अब क्या लिखू
अब क्या लिखू

रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

Comments

Anonymous said…
ehh. 10x for thoughts :))

Popular posts from this blog

Kesarwani Matrimonial: Pratima Bani

अखिल भारतीय केसरवानी वैश्य महिला सभा के पदाधिकारियों की सूची

गणतंत्र दिवस 2026 और AI की नई क्रांति: क्या अब 'एजेंट्स' संभालेंगे हमारा काम?