बाबूजी की लाल बही: जिसे खोलते ही पूरे समाज की आँखें भीग गईं
तेरहवीं के अगले दिन सुबह-सुबह बड़े बेटे आनंद ने पिता की पुरानी तिजोरी खोली। उसे उम्मीद थी कि अंदर गहने होंगे, ज़मीन के कागज़ होंगे, शायद कोई वसीयत भी। पर तिजोरी में बस एक ही चीज़ रखी थी — लाल कपड़े में लिपटी हुई एक पुरानी बही। और उसके पहले पन्ने पर काँपते हाथों से लिखा था: "इसे मेरे जाने के बाद, पूरे समाज के सामने खोलना। अकेले में पढ़ोगे, तो ग़लत समझोगे।" उस दिन आनंद को नहीं पता था कि यह बही सिर्फ़ उसके पिता की नहीं, पूरे रामनगर के केसरवानी समाज की आत्मा का आईना बनने वाली है। रामनगर की वो पुरानी दुकान रामनगर की सराफ़ा गली के मोड़ पर "शिवचरण मिष्ठान्न भंडार" पिछले साठ साल से खड़ा था। बाहर लकड़ी का पुराना बोर्ड, जिसके अक्षर धूप और बरसात में फीके पड़ चुके थे, और अंदर काँच के शो-केस में सजे केसरिया पेड़े, बालूशाही और इमरती। सुबह चार बजे भट्ठी जल जाती और पाँच बजते-बजते पूरी गली में खोए और इलायची की ऐसी महक फैल जाती कि लोग बिना अलार्म के जाग जाते। दुकान के मालिक थे लाला शिवचरण केसरवानी। उम्र पचासी के पार, कद छोटा, धोती-कुर्ता और कंधे पर हमेशा एक सफ़ेद अंगोछा। गल...