लघुकथा : खांसी

लघु कथा खांसी

आज मीरा जल्दी तैयार हों रही थी। हों भी क्यूँ ना, उसको दील्ली जो जाना था अपने पतीके पास। सारा सामान पैक करने के बाद उसने देखा कि बच्चे कमरे मे नहीं है। वो उनको खोजते खोजते पास के ससुर के कमरे मे गई। वहां पर बच्चे खेल रहे थे। मीरा ने उनको देखा और बोली " बाबूजी ! बच्चे तो नासमझ है पर आपको तो समझ है। आपको कई तरह की बीमारी है अगर वो बच्चों को लग गयी तो इसका जिम्मेदार कों होगा। उस पर से आप दिन भर खांसते रहते है। मुझे आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। " इतना कहकर मीरा बच्चों को लेकर एअरपोर्ट के लिए निकल गयी। उधर बेचारे बाबूजी देखते रह गए।

सर्दी के दिन थे । जैसे जैसे सात गहराती गयी बाबूजी की खांसी बढती गई। सामने से खुली खिड़की ने आग मे घी का काम किया और उनकी खांसी को और बढ़ा दिया। बाबूजी ने जैसे ही दावा की शीशी को हाथ लगाया वह गिरकर टूट गयी। बेचारे बाबूजी भी क्या करते। घर मे कोई था भी नही जिसे आवाज़ देते। रात भर खांसते खांसते गुजार दी।

सुबह कामवाली बाई राधिका आयी तो बाबूजी के लिए तुंरत गरम अदरक वाली चाय बनायी। जिससे बाबूजी और उनके गले दोनों को आराम मिला। इतने मे राधिका ने फोन किया और बोली " बीबी जी ! कल रात कालोनी के चार घरों मे चोरी हुई थी पर आपका घर बच गया, शायद बाबूजी की खांसी कि वजह से चोर घर मे घुसने की हिम्मत न कर सके।" उधर से आवाज़ आयी " थैंक्स गोड !"

लेखक- रवि प्रकाश केशरी, वाराणसी

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