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श्री गणेशाय नमः


Wednesday, December 16, 2009

लघु कथा: अपनापन

लघु कथा: अपनापन
आशुतोष ऑफिस से निकलते समय काफी खुश था. आज उसका प्रोमोशन लैटर उसके हाथों में था. उसने ऑफिस में आज सबको मिठाई खिलाई और सन्डे को पार्टी का एलान भी कर दिया. रास्ते में आशुतोष ने अपनी पत्नी के लिए एक अच्छी सी साड़ी खरीदी. वो आज यह खुशखबरी अपनी पत्नी नीता को सरप्राइज़ के साथ देना चाहता था. घर पहुँचते ही उसने कालबेल बजाई. मन ही मन आशुतोष खुश हों रहा था. उसने सोच लिया था कि दरवाज़ा खुलते ही वह नीता को गले से लगा लेगा.

लेकिन जैसे ही दरवाज़ा खुला भान्ताबाई को देखकर आशुतोष का सारा प्यार और ख़ुशी मानो पाताल में चली गयी. आशुतोष ने खुद को संभालते हुए बाई से पूछा " नीता कहाँ है? " भान्ताबाई बोली " साब, मेमसाब आज देर से आएँगी. " आशुतोष आँख फाड़ते हुए गुस्से में बोला "क्यों!" भान्ताबाई बोली " साब, मेमसाब ने ऑफिस से फोन किया था. उनका प्रोमोशन हों गया है और वो ऑफिस के लोगों से साथ डिन्नर पर गयी है , देर से आएँगी ."

आशुतोष को तो मानो काटो तो खून नहीं, उसे सांप सूंघ गया. उसने तुरंत नीता को फोन लगाया.  नीता बोली " मैंने तुम्हारा फोन लगाया था पर लगा नहीं, सो घर पर भान्ताबाई को सब बता दिया था. तुम आज अकेले ही डिन्नर कर लेना सॉरी "
आशुतोष ने फ़ोन उठा कर पटक दिया. आशुतोष का यह रूप देखकर भान्ताबाई डरकर रसोई में चली गयी.

आशुतोष पहले जितना खुश था अब उतना ही दुखी. वह खुद को और नीता को तौलने लगा. थोड़ी देर में जब भान्ताबाई चाय ले कर आई तो आशुतोष ने साड़ी का पैकेट भान्ताबाई कि ओर बढ़ाया . भान्ताबाई ने पूछा " साब! ये क्या है? " आशुतोष बोला " इसमें साड़ी है रख लो! आखिर तुम हमारी इतनी सेवा भी तो करती हों! आखिर तुमसे भी तो हमारा अपनापन है! "

भान्ताबाई को साडी देकर आशुतोष ने भान्ताबाई से अपनापन दिखाया या अपने से अपनापन ख़त्म किया, ये तो केवल आशुतोष ही जानता था!

लेखक:
रवि प्रकाश केशरी, वाराणसी
मोबाइल: 9889685168