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श्री गणेशाय नमः


Wednesday, December 17, 2008

कविता: सर्दी

सर्दी की कुनकुनी धूप
छत पर उतर आई है
कुहासे के चादर से ढकी
अलसाई सुबह शरमाई है !
पंखुडी पर टिकी ओस
जमीं से मिलने को तैयार है
अधूरे ख्वाबों की राह में
उम्मीद की किरण ज्यादा है !
सर्द हवा हौले -हौले
मन में सिहरन फैलाती है
कुहासे की तरह अपना
विस्तार फैलाती है


-रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी


1 comments:

creativekona said...

Vivek ji
Apkee salah aur tareef ke liye dhanyavad.Maine apne blog par live trafik laga liya hai.
Apke blog par prakashit Sardee kavita bal man ke anuroop hai.Ravi Prakash ji ko meree badhai.
Hemant Kumar